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मां के भीतर होती है प्रेम की अपार क्षमता - ब्रह्माकुमारी मंजू

           मां के भीतर होती है प्रेम की अपार क्षमता - ब्रह्माकुमारी मंजू तपस्वी माताओं की भावपूर्ण तपस्या के साथ पांच दिवसीय योग-साधना कार्यक्रम सम्पन्न ‘‘मातृत्व की भावना को हम उम्र की सीमा में, व्यक्ति विषेष या संबंध विषेष तक नहीं बांध सकते, यह गुण अनन्त, अपरीमित, असीमित है जो केवल अपने बच्चों के लिए ही नहीं अपितु पूरे विष्व की आत्माओं के लिए भी उमड़ सकती है। मां का दिल तो ऐसा है जो स्वयं भगवान को भी गोद में खिला सकती है। सभी माताओं को एक ऐसा पालनहार बनना है जिसके भीतर प्रेम, आदर, नेतृत्व, आंतरिक शुभ भावना-षुभ कामना, निरहंकारिता, हद की बातों से परे होने, सबके प्रति समदृष्टि अर्थात् आत्मिक दृष्टि रखने और अंदर से मजबूत अर्थात् रोनाप्रूफ का गुण हो। रोनाप्रूफ बनने के लिए साक्षीपन का गुण होना आवष्यक है। जैसे कोई फिल्म देखते समय यदि हम फिल्म कॉन्षियस या रोल कॉन्षियस हो जाते हैं तो हमें रोना आ जाता है। लेकिन यदि यही दृष्य हम साक्षीभाव में देखते हैं तो आनंद की अनुभूति करते हैं। हम सभी को अपने जीवन में क्रोध का अनुभव है कि हमें क्रोध करने के बाद बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता जबकि प्यार देने व लेने, खुषी बांटने में अच्छी अनुभूति होती है। ध्यान कुछ और नहीं है बल्कि गहरी प्रेम की अवस्था है।’’ ये बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में चल रहे पांच दिवसीय योग-साधना कार्यक्रम के अंतिम दिन गृहस्थ धर्म में रहते राजयोग का अभ्यास करने वाली माताओं को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। आपने प्रातःकाल से ही सभी माताओं को जगतमाता का स्वमान देते हुए योग साधना की शुरूआत की। योग साधना के साथ-साथ आपने सभी माताओं को अपने-अपने घर को मंदिर जैसा बनाने के लिए पवित्रता के साथ-साथ छोटे-बड़े सभी के प्रति मन-वचन-कर्म से निःस्वार्थ प्रेम की भावना, क्षमा का भाव रखने की बात कही क्योंकि शरीर की उम्र जो भी हो किन्तु आत्मा तो अविनाषी है न। बडा़ें-छोटों सभी की गलती पर क्षमा भी हमें ही करनी है और उनकी पालना भी करनी है। कोई कार्य हमें करना है तो उसके दो तरीके हो सकते हैं चाहे मजबूरी के साथ दुखी होकर करना या फिर खुषी-खुषी करना तो क्यों न खुषी से ही हर कार्य किया जाय। भोजन बहुत शुद्धता से, प्यार से व विषेष परमात्मा की याद में रहकर बनाना है और भोग लगाकर ही घरवालों को खिलाना है। क्योंकि भोग लगाने के बाद वह भोजन प्रसाद बन जाता है और प्रसाद में बहुत शक्ति होती है।

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