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श्रेष्ठ संस्कार के निर्माण के लिए नियमित सकारात्मक चिंतन व ध्यान मददगार-ब्रह्माकुमारी मंजू

          बुरे संस्कार बदलने के लिए दृढ़ता का संस्कार जरूरी- राजयोग शिविर के पांचवे दिन बताए संस्कार निर्माण के पांच आधार... ‘‘आत्मा की कर्मशक्ति का नाम संस्कार है। किसी भी कार्य को जब हम बार-बार करते हैं तब वह हमारा संस्कार बन जाता है। हमारे जीवन में संस्कार निर्माण के पांच आधार हैं-अनादि संस्कार या मूल संस्कार। ये संस्कार आत्मा के मूल गुणों सुख, शान्ति, आनन्द, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति पर आधारित संस्कार हैं। दूसरा है पूर्व जन्म के संस्कार। तीसरा माता-पिता द्वारा दिये गए संस्कार। चौथा वातावरण द्वारा निर्मित संस्कार। और पांचवा खुद की दृढ़ता की शक्ति के आधार पर स्वयं द्वारा निर्मित संस्कार। यदि हमें पूर्व जन्म में व इस जन्म में अच्छे संस्कार नहीं मिले और इस जन्म में भी खराब वातावरण के कारण हमारे संस्कार गलत बन चुके हैं तो दृढ़ता के आधार पर निर्मित संस्कार के द्वारा हम अपने बुरे संस्कारों को समाप्त कर अच्छे संस्कारों का निर्माण कर सकते हैं। दृढ़ता की शक्ति लाने में सकारात्मक चिंतन और राजयोग मेडिटेशन दोनों की नियमितता हमें मदद करती है।’’ ये बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में चल रहे राजयोग शिविर के पांचवें दिन शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। कल के सत्र में ब्र.कु. गायत्री बहन राजयोग का आधार एवं विधि विषय पर व्याख्यान लेंगी।

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